तेज़ाब हमले

होना तो यह चाहिए कि फ़िल्म छपाक के हवाले से ही सही, तेज़ाब से पीड़ित लड़कियों की व्यथा, इस अपराध को रोकने के उपायों, दोषियों को दंडित करने आदि पर चर्चा हो.

देविंदर सिंह के हवाले से

संसद हमले और उससे जुड़े किरदारों के बारे में कुछ भी साफ़ नहीं हो सका है. लगता है, संसद हमला मामला एक कभी न ख़त्म होनेवाली कहानी है. किरदारों का आना-जाना लगा रहेगा…

यह है छठ पूजा

कांच ही बांस के बहन्गिया बहंगी लचकत जाये होईं न बलम जी कहंरिया बहंगी घाटे पहुंचाए…..

धुर-दक्षिणपंथ का आदर्श जोसेफ मैकार्थी

मैकार्थी के इस दक्षिणपंथी हमले के शिकार कई लोग आज दुनिया भर में आदरणीय हैं. कुछ नाम तो बीसवीं सदी के महानतम व्यक्तित्व हैं- अल्बर्ट आइंस्टीन, चार्ली चैप्लिन, बर्तोल्त ब्रेष्ट, हॉवर्ड फास्ट, एलेन गिंसबर्ग, पॉल स्वीजी, ऑरसन वेल्स.

‘स्वदेश तुम कहाँ गुम हो गए…’

इस संग्रह को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए ताकि हमें अपने वर्तमान के उन अँधेरे कोनों, असुरक्षा के भय और तमाम आशंकाओं का संज्ञान हो सके, जिन्हें हम लगातार देखते-बूझते भी नजरअंदाज़ करते रहते हैं. 

जब पूंजी कांपती है, हम सब कांपते हैं

साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की चिंताजनक छाया एक बार फिर मंडरा रही है। कार्ल मार्क्स का कहना था कि पैसा इतिहास की धारा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है और इस पैसे की धारा तय करनेवाली बैंकिंग व्यवस्था को थॉमस जेफरसन आजादी के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे। आर्थिक मंदी... Continue Reading →

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