Delhi Crime: ऐसी अपराध कथा जिसमें अपराधियों के लिए जगह ही नहीं है!

पॉपुलर कल्चर और पब्लिक स्फेयर में अपराध कथाओं की एक ख़ास जगह है. इसमें पाठक या दर्शक सिर्फ़ भावनात्मक तौर पर ही प्रतिक्रिया नहीं देता है, बल्कि वह एक गवाह, खोजी और जज की भूमिका में भी होता है.

वर्तमान के विद्रूप का चित्रण ‘गुलाबो सिताबो’

अनुराग कश्यप की हालिया फ़िल्म ‘चोक्ड’ के साथ ‘गुलाबो सिताबो’ को रखकर देखें, तो यही लगता है कि हमारे दौर की विडंबनाओं को कथा में कहना अब लगातार मुश्किल होता जा रहा है.

‘जितना अपनी पैंट खोलते हो, उतना ही दिमाग भी खोलो’!

सेक्सुअलिटी की इस तरह की सतही समझ से दमित सेक्सुअलिटी को कुछ होना होता, तो दादा कोंड़के से लेकर भोजपुरी सिनेमा के भौंड़ेपन ने अब तक क्रांति कर दी होती!

‘नया दौर’ और 1957 का साल

'नया दौर' के तेवर और उसकी बहुआयामी राजनीति उन समझदारियों को ख़ारिज़ करते हैं, जिनका मानना है कि मेलोड्रामाई पॉपुलर सिनेमा अराजनीतिक होता है और पारंपरिक मूल्यों को अपने स्टिरीयो-टाइप फॉर्मूले में ढोता है.

‘स्वदेश तुम कहाँ गुम हो गए…’

इस संग्रह को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए ताकि हमें अपने वर्तमान के उन अँधेरे कोनों, असुरक्षा के भय और तमाम आशंकाओं का संज्ञान हो सके, जिन्हें हम लगातार देखते-बूझते भी नजरअंदाज़ करते रहते हैं. 

जब पूंजी कांपती है, हम सब कांपते हैं

साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की चिंताजनक छाया एक बार फिर मंडरा रही है। कार्ल मार्क्स का कहना था कि पैसा इतिहास की धारा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है और इस पैसे की धारा तय करनेवाली बैंकिंग व्यवस्था को थॉमस जेफरसन आजादी के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे। आर्थिक मंदी... Continue Reading →

कहो जी तुम क्या क्या खरीदोगे…

बारह किस्सों की यह किताब किस्सा तो है ही, वह इतिहास, समाजशास्त्रीय अध्ययन और सांस्कृतिक रिपोर्ट भी है. वह बहुत गहरे कहीं टीसती बेचैनी का त्रासद काव्य भी है.

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