‘स्वदेश तुम कहाँ गुम हो गए…’

इस संग्रह को इसलिए भी पढ़ा जाना चाहिए ताकि हमें अपने वर्तमान के उन अँधेरे कोनों, असुरक्षा के भय और तमाम आशंकाओं का संज्ञान हो सके, जिन्हें हम लगातार देखते-बूझते भी नजरअंदाज़ करते रहते हैं. 

तकता है तेरी सूरत हर एक तमाशाई…

यतींद्र मिश्र ने इस किताब के तमाम हिस्सेदारों के साथ मजमुआ की शक्ल में अख़्तरीबाई फ़ैज़ाबादी का आलीशान मुजस्समा बनाया है.

कहो जी तुम क्या क्या खरीदोगे…

बारह किस्सों की यह किताब किस्सा तो है ही, वह इतिहास, समाजशास्त्रीय अध्ययन और सांस्कृतिक रिपोर्ट भी है. वह बहुत गहरे कहीं टीसती बेचैनी का त्रासद काव्य भी है.

दार्शनिक पृष्ठभूमि महत्वपूर्ण

प्रश्न शंकराचार्य को मानने या न मानने का नहीं है, आवश्यकता उनकी पद्धति, प्रणाली और प्रक्रिया से परिचय की है.

अपने ही जाल में उलझा भोजपुरी सिनेमा

जैसे बिहार और पूर्वांचल की राजनीति पिछड़ेपन, भ्रष्टाचार और अन्याय के मुद्दों पर बतकही से चलती है, वैसे ही भोजपुरी सिनेमा की विषय-वस्तु भी इन मुद्दों को सतही तरीके से अभिव्यक्त करती है.

वी. शांताराम: भारतीय सिनेमा के अण्णा साहेब

शांताराम की उपलब्धियों और उनके महत्व का आकलन ठीक से तभी हो सकता है, जब हम उनकी फिल्मों के साथ-साथ सिनेमाई इतिहास में उनके योगदान को हर आयाम से समझने का प्रयास करें.

अकथ कहानी प्रेम की

यह किताब कबीर को एक नयी रौशनी में समझने की दृष्टि तो देती ही है, साथ ही अबतक की हमारी ऐतिहासिक समझदारी को भी झकझोर देती है.