जेरूसलम में जीसस

ओ जेरूसलम, जेरूसलम, तुम उन पैगंबरों की हत्या कर देते हो, उन्हें संगसार कर देते हो, जिन्हें तुम्हारे लिए भेजा गया – जीसस

यह निश्चित तौर पर नहीं कहा जा सकता है कि जीसस ने अपने जीवनकाल में कितनी दफ़ा जेरूसलम की यात्रा की थी. चूँकि उनका गाँव नाज़रथ पवित्र शहर से ज़्यादा दूर नहीं था और साल में अनेक ऐसे मौक़े होते थे, जब देश-दुनिया से यहूदी पवित्र मंदिर में प्रार्थना के लिए जमा होते थे, तो यह तो कहा ही जा सकता है कि वे कई बार, ख़ासकर पासओवर जैसे बेहद अहम अवसर पर, जेरूसलम गये होंगे. ‘न्यू टेस्टामेंट’ में उनके अनुयायियों ने उनकी कुछ यात्राओं का विवरण दिया है. यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि इसमें संकलित चार वृत्तांतों (सुसमाचार) में अंतर है. उन उल्लेखों के बारे में बहुत अध्ययन हुआ है.

जीसस अपने बढ़ई पिता युसुफ़ के साथ 

बाइबिल से हमें जो जानकारी मिलती है, उसके मुताबिक जीसस की पहली जेरूसलम यात्रा तब हुई थी, जब उनकी आयु आठ दिन की थी. उनका ख़तना होने और धार्मिक विधि-विधान के अनुसार शुद्धिकरण के बाद पिता यूसुफ़ (जोसेफ़) और माता मरियम (मेरी) ईश्वर के सामने बच्चे को पेश करने के लिए पवित्र मंदिर लेकर आये थे. कुछ जानकारों का मानना है कि तब उनकी आयु 40 दिन की हो सकती है क्योंकि माता की शुद्धि के लिए शास्त्रों के मुताबिक यह अवधि निर्धारित थी.

बहरहाल, त्योहार की उस भीड़-भाड़ में भी दो लोगों ने जीसस के दैवी व्यक्तित्व का अहसास कर लिया था. सीमियन नामक सम्मानित बुज़ुर्ग ने बच्चे को देखते ही ईश्वर का धन्यवाद किया कि उसने मुक्ति के दर्शन कराये. उसने माता-पिता से यह भी कहा कि यह बालक इज़रायल में कई लोगों के उत्थान और पतन का कारण बनेगा तथा एक तलवार तुम्हारी आत्मा को भी भेदेगी. एक पवित्र महिला अन्ना ने जीसस के बाबत कहा कि यह वही है जिसका इंतज़ार हम जेरूसलम की मुक्ति के लिए कर रहे हैं. ऐसे मौक़ों पर धनी लोग भेड़ की क़ुर्बानी दिया करते थे, लेकिन बढ़ई यूसुफ़ अपनी हैसियत के मुताबिक सिर्फ़ दो बत्तख़ों या कबूतरों की बलि ही चढ़ा पाए थे.  

जेरूसलम में जीसस के होने का दूसरा आख्यान तब का है, जब वे 12 साल के थे. पासओवर के त्योहार के लिए वे अपने माता-पिता और सगे-संबंधियों के साथ आये थे. यह त्योहार मिस्री फ़िरौनों से इज़रायलियों की आज़ादी मिलने के लिए मनाया जाता है. यह यहूदियों के सबसे बड़े त्योहारों में से है.

एक हफ़्ते शहर में रूकने और विभिन्न आयोजनों में हिस्सा लेने के बाद यूसुफ़ और अन्य लोग नाज़रथ लौट रहे थे. जीसस अपने माता-पिता के साथ नहीं थे. यूसुफ़ ने सोचा कि बच्चा कारवाँ में शामिल परिवार के लोगों के साथ होगा. कहीं रात बिताने के लिए जब लोग रूके, तो यूसुफ़ ने पाया कि जीसस कहीं नहीं हैं. बेचैन माता-पिता बच्चे की तलाश में वापस जेरूसलम आये. वहाँ भी दो दिनों तक पता नहीं चल सका. तीसरे दिन पवित्र मंदिर में उन्होंने 12 साल के अपने बच्चे को बुज़ुर्ग पुजारियों से धार्मिक चर्चा करते हुए पाया. बच्चा बहुत गंभीरता से बातचीत कर रहा था. पुजारी भी उसकी समझ से बहुत प्रभावित थे.

जब माता ने जीसस से कहा कि वे सब परेशान हैं और उसने ऐसा क्यों किया, तो जवाब मिला कि इसमें परेशान क्या होना था, क्या उन्हें यह पता नहीं था कि वह अपने पिता के घर में ही होगा. तब किसी को क्या अंदाज़ा था कि बीस साल बाद यही बालक इसी मंदिर में इन्हीं पुजारियों से फिर बहस करनेवाला था. और, इसी शहर में उसे सलीब पर लटका दिया जाना था. बहरहाल, माँ-बाप जीसस को लेकर नाज़रथ लौट आये.

जीसस के वक़्त में नाज़रथ की आबादी 4-500 थी और इसको लेकर अलग-अलग राय है कि बेथलहम से जेरूसलम और फिर वहाँ से नाज़रथ शीशु जीसस ले जाए गए या फिर हेरोड के आदेश पर बेथलहम में पैदा हुए दो साल से कम आयु के तमाम बच्चों को मारे जाने से जीसस को बचाने के लिए यूसुफ़ और मरियम को बच्चे के साथ मिस्र में शरण लेनी पड़ी थी. हालाँकि ऐतिहासिक रूप से बच्चों के क़त्ले-आम के सबूत नहीं है और बाइबिल में सिर्फ़ एक विवरण में मिस्र जाने की बात कही गयी है, पर यदि ऐसा हुआ था, तो मिस्र में शरण लेने की बात तार्किक लगती है क्योंकि तब वहाँ यहूदियों की अच्छी-ख़ासी तादाद थी.

मिस्र और जूडिया पर रोमनों का शासन था, लेकिन मिस्र में हेरोड के क़हर से बचा जा सकता था. वह हेरोड के शासन में नहीं था और हेरोड अपनी गद्दी बचाने के लिए दाऊद/डेविड के ख़ानदान में पैदा हुए यहूदियों के नए राजा को मार देना चाहता था. मैथ्यू के सुसमाचार में कहा गया है कि यूसुफ़ का परिवार दो साल मिस्र में रहा और हेरोड की मौत की बाद ही नाज़रथ लौटा. सिमॉन मोंटेफ़ियोरे ने लिखा है कि हेरोड इतिहास में उस अपराध के लिए सबसे ज़्यादा बदनाम हुआ, जो उसने किया ही नहीं था.

सम्राट हेरोड का महल

ख़ैर, नाज़रथ के जीसस के बेथलहम में पैदा होने की कथा से सब परिचित ही हैं, तो उसके विस्तार में जाने की ज़रूरत नहीं है. रोमन शासक आगस्टस ने पहली बार तमाम साम्राज्य की जनगणना का आदेश दिया था. उसी के लिए गर्भवती मरियम को लेकर यूसुफ़ बेथलहम आए थे. उस दौर में जेरूसलम और जूडिया के यहूदी हेरोड की हरकतों तथा रोमनों के दख़ल से परेशान थे तथा धार्मिक और सामाजिक स्तर पर असंतोष बढ़ रहा था.

उन्हीं दिनों हेरोड ने पवित्र मंदिर के दरवाज़े के ऊपर बाज़ का बुत भी लगवा दिया, जो कि रोमन शाही चिन्ह था. इस बात से अनेक यहूदी चिढ़े हुए थे. हेरोड अपने बेटों के कथित षड्यंत्रों से परेशान था ही, उसका पूरा शरीर कई रोगों से सड़ता जा रहा था. उसके मरणासन्न होने की ख़बर सुनकर दो यहूदी साधुओं ने अपने शिष्यों से उस बाज़ को गिरवा दिया. लेकिन हेरोड ज़िंदा था और उसने इन साधुओं को मौत के घाट उतार दिया. आर्म्सस्ट्रॉंग ने लिखा है कि जब कुछ दिन बाद हेरोड मरा, तो माना गया कि उसे इन पवित्र लोगों के क़त्ल की सज़ा मिली है.

यहाँ यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि भले ही यहूदी रोमन शासन या हेरोड के राज से परेशान थे, पर उनका मुख्य आग्रह यह था कि पवित्र मंदिर के मामले में कोई दख़ल ना दिया जाए. हेरोड एक क्रूर शासक था और पूरी ज़िंदगी अपनी बीवी, बेटों, बड़े दरबारियों और अधिकारियों को मारता रहा था, पर उसके शासनकाल में आम तौर पर पूरे राज में अमन क़ायम रहा था. जब उसने अपने बेटों को मारा, तो रोमन शासक आगस्टस ने टिप्पणी की थी कि वह हेरोड का बेटा होने की जगह उसका सूअर होना पसंद करेगा. यहूदी होने के कारण हेरोड सूअर नहीं मार सकता था, पर बेटों और क़रीबियों को ज़रूर मार सकता था.

जीसस और एंटिपस

मार्च, 4 ईसापूर्व में 37 सालों तक राज करने के बाद बीमार हेरोड की मौत हो गयी और रोमन शासक आगस्टस के आदेश से उसका राज उसके तीन बेटों में बाँट दिया गया. एंटीपस को गैलीली का इलाक़ा मिला था, जिसके तहत नाज़रथ भी आता था. जेरूसलम उसके भाई आरकेलस के पास था, जिसे क्रूरता के कारण तुरंत ही हटा दिया गया. इस कारण वह भी एंटीपस को मिला गया था.

लेकिन रोमनों ने इनमें से किसी को भी राजा की पदवी नहीं दी थी और इन्हें दो कारणों से शासक बनाए रखा गया था- एक, सीधे शासन से रोमनों को यहूदियों के विद्रोह का डर था, और दूसरा यह कि हेरोड वंश से रोमन शासकों की नज़दीकी थी. हेरोड की मौत के समय जेरूसलम और फ़िलीस्तीन के कई इलाक़ों में प्रदर्शन हुए थे और रोमनों ने बड़ी संख्या में हत्याएँ की थीं.

पवित्र मंदिर

रोमनों की लगातार कोशिश यही रहती थी कि यहूदियों की धार्मिक भावनाओं को कोई चोट नहीं पहुँचे और उनके आपसी विवादों का निपटारा वे ख़ुद करें. रोमन नहीं चाहते थे कि ख़ून-ख़राबा हो और इस इलाक़े में उनके शासन को परेशानी हो. लेकिन 26 ईस्वी में नए रोमन प्रीफ़ेक्ट पांटीयस पाइलेट ने रात के अंधेरे में एक सैनिक टुकड़ी जेरूसलम भेजी और पवित्र मंदिर से कुछ दूर रोमन शासक की बड़ी तस्वीर टाँग दी. जब सुबह यहूदी जगे, तो बौखला गए. वे जुलूस के रूप में रोमनों की स्थानीय राजधानी सीज़ेरिया पहुँच गए और पाइलेट के आवास पर धरना दे दिया. पाँच दिनों तक वे वहीं रहे और तब पाइलेट उन्हें बातचीत के लिए एम्पीथिएटर में जमा किया.

जब भीड़ वहाँ जमा हो गयी, तो अचानक चारों ओर से तलवार लिए सैनिकों ने जेरूसलम के लोगों को घेर लिया. लेकिन यहूदी डरे नहीं. वे शांति से ज़मीन पर झुक गए और गर्दनें आगे कर दीं. वे कह रहे थे कि धार्मिक क़ानून तोड़ने के बजाय वे मारा जाना पसंद करेंगे. यहूदियों को हेरोड की मौत के बाद हुआ क़त्ले-आम भी याद था और वे शांति से अपना विरोध दर्ज करना चाहते थे. यह पाइलेट के लिए भी बड़ी सीख थी. उसने तुरंत सीज़र की तस्वीरें हटाने का आदेश दे दिया.

सेंट जॉन

इस घटना के चार साल बाद मंदिर में एक और बड़ा विवाद होनेवाला था. जैसा कि पहले लिखा गया है कि उस दौर पर यहूदियों में धार्मिक आचार-व्यवहार को लेकर अलग-अलग साधु-संत अपनी व्याख्याएँ दे रहे थे और उनमें से अनेक हेरोड एंटीपस और रोमनों के आलोचक थे.

इन्हीं में से एक थे जान द बैपटिस्ट. वे पवित्र मंदिर के एक प्रतिष्ठित पुजारी ज़कारिया के बेटे थे. वे शहर के क़रीब ही एक बस्ती में रहते थे. जॉन ने सादगी और फ़क़ीरी का जीवन चुना था तथा शहर से बाहर उनके अनुयायियों की तादाद बड़ी थी. दूसरी तरफ़ एंटीपस था, जो लोगों से लगान वसूली कर ऐश की ज़िंदगी जीता था. उसकी बीवी एक अरब शहज़ादी थी. इस शादी से अरबों के साथ शांति रखने में बड़ी मदद मिली थी. पर, क़रीब तीस साल गद्दी पर रहने के बाद उसे अपनी भतीजी हेरोडियास से प्रेम हो गया. हेरोडियास के पिता को हेरोड ने मरवा दिया था. इस शहज़ादी ने शादी के लिए शर्त रखी कि एंटीपस अपनी अरबी बीवी को तलाक़ दे दे. जॉन द बैपटिस्ट ने इस संबंध का खुला विरोध किया और इसे आपराधिक बताया. इस पर एंटीपस ने अपनी अरबी बीवी के साथ जॉन को भी गिरफ़्तार कर लिया.

एंटीपस के जन्मदिन के जश्न में हेरोडियास की बेटी सेलोम ने भी नाच दिखाया था. सेलोम हेरोड महान के बेटे फ़िलीप से ब्याही थी, जो कि हेरोड के राज के एक तिहाई का वारिस था. कहते हैं कि सात परदों के बीच उसने स्ट्रीपटीज़ किया था. उसके नाच से ख़ुश होकर एंटीपस ने उससे उपहार माँगने को कहा. अपनी माँ के उकसावे पर उसने जॉन द बैप्टिस्ट का सिर माँगा. कुछ ही देर में तहख़ाने में बंद फ़क़ीर का सिर माँ-बेटी के सामने था.

कुछ आख्यानों में कहा गया है कि जॉन और जीसस संबंधी भी थे. जीसस का बपतिस्मा जॉन ने ही कराया था. इसी बीच जीसस विभिन्न शहरों और जेरूसलम के आसपास अपना संदेश प्रचारित कर रहे थे. उनके अनुयायियों की संख्या बढ़ रही थी. जॉन द बैपटिस्ट और अन्य संतों के साथ जो कुछ हुआ था, उससे वे कुछ सावधान भी रहते थे. उनके संदेशों में तत्कालीन शासकों के बारे में या समाज की स्थिति के बारे बहुत कम उल्लेख हुआ है. उनका ज़्यादा मतलब आसन्न क़यामत और क़यामत के बाद के दौर से रहा. 

अब्राहम की परंपरा से निकले तीन धर्मों- यहूदी, ईसाइयत और इस्लाम- के प्रवर्तकों में अकेले जीसस ही हैं, जो जेरूसलम पहुँचे और वहाँ उन्होंने धर्म और ईश्वर के बारे में बयान दिया. माना जाता है कि पैगंबर मुहम्मद 610 ईसवी में चमत्कारिक बुराक़ से एक रात जेरूसलम पहुँचे थे और पहले के कुछ नबियों से मिले थे. उसी रात उन्होंने जन्नत की यात्रा भी की थी.

ख़ैर, शहर से बाहर होते हुए भी जीसस के ख़्याल में जेरूसलम रहता था. उन्होंने कहा है- ओ जेरूसलम, जेरूसलम! तुम तुम्हारे लिए भेजे गए पैगंबरों को मार देते हो, संगसार करते हो. कितनी बार मैंने चाहा कि तुम्हें अपने आग़ोश में उसी तरह ले लूँ, जैसे मुर्ग़ी अपने चूज़ों को अपने पंखों में छुपा लेती है. मगर तुम ऐसा नहीं चाहते थे. लेकिन ऐसा भी नहीं है कि उन्होंने तत्कालीन हालात पर नहीं बोला.

जब एंटीपस ने अपने क़रीबियों से जीसस को मार देने के बारे चर्चा किया, तो उनमें से कुछ जीसस के पास समझाने गए. उन्हें जीसस से भी लगाव था. इस पर जीसस ने कह दिया कि जाओ, उस लोमड़ी से कह दो, मैं अपना काम जारी रखूँगा. दो दिन शहर से बाहर उपदेश देकर तीसरे दिन उस शहर में आऊँगा, जहाँ परमेश्वर का पुत्र अपना कर्तव्य निभाएगा. वह जेरूसलम के बाहर कहीं और तबाह नहीं हो सकता. उसी दौरान उन्हें टैक्स देने के मामले में पूछा गया कि यदि आप ईश्वर के पुत्र हैं और हमारे राजा हैं, तो हम सीज़र को टैक्स क्यों दें. वे समझ गए कि उनके जवाब से उन्हें फँसाने की कोशिश हो सकती है. उन्होंने सिक्का माँगा और उसे दिखाकर पूछा कि इस पर किसकी तस्वीर बनी है. लोगों ने कहा- सीज़र की. सिक्के को वापस देते हुए जीसस ने कहा- जो सीज़र का है, वह सीज़र को दे दो. जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को दे दो. 

उधर एंटीपस परेशान था. कहता था- मैंने जॉन द बैप्टिस्ट को मार दिया था, वह फिर ज़िन्दा हो उठा. उसकी अरबी बीवी क़ैद से निकल के भागकर अपने पिता के यहाँ पेट्रा पहुँची. पेट्रा के धनी शासक ने बेटी से कहानी सुनी और एंटीपस पर हमला बोल दिया. हालांकि रोमन शासक टाइबेरियस की सहानुभूति एंटीपस के साथ थी, पर रोमनों ने इस आपसी लड़ाई से ख़ुद को दूर ही रखा.

साल 33 में पासओवर के मौक़े पर शास्त्रों की भविष्यवाणियों के अनुसार मसीहा गदहे पर सवार होकर जेरूसलम में दाख़िल हुआ और मंदिर की ओर बढ़ा. वह कहता था- मैं पैगंबरों के क़ानून को ख़त्म करने के लिए नहीं आया हूँ. मैं तो उन्हें पूरा करने आया हूँ. मंदिर गया तो देखा कि वहाँ धर्म का धंधा हो रहा है, बाजार लगा है, उसने दुकानों को उजाड़ना और कारोबारियों को मारना शुरू कर दिया. मेरे पिता के घर को तुमने बाजार बना दिया है, वह कहता जाता था.

जब वह लौट रहा था, तो उसके एक अनुयायी ने मंदिर की ओर देखते हुए कहा- कितना भव्य है यह, पत्थर कितने सुंदर हैं! जीसस ने कहा- यहाँ कुछ भी नहीं बचेगा. सब इमारतें ढाह दी जाएँगी. कुछ दशकों बाद यही हुआ और रोमनों ने मंदिर को नेस्तनाबूद कर दिया.

कुछ देर बाद ज़ैतून की पहाड़ी पर वह यह भी कहता है- मेरे बाद मेरे नाम पर कई आएँगे और अपने मसीहा होने का दावा करेंगे. कभी जीसस ने यह भी कह दिया कि मैं शांति के लिए नहीं आया हूँ, मैं तो तलवार लेकर आया हूँ. तीसरे दिन उसे सलीब ले जाते देख औरतें रोती जाती थीं. वह कहता था- ओ जेरूसलम की बेटियों, मेरी ख़ातिर मत रोओ, बल्कि अपने लिए और अपने बच्चों के लिए रोओ. क्योंकि एक ऐसा भी वक़्त आयेगा, जब तुम कहोगे, ‘ख़ुशकिस्मत हैं बाँझ औरतें, ख़ुशकिस्मत हैं वो कोखें जिनने जना नहीं और ख़ुशकिस्मत हैं वो छातियाँ जिनने दूध नहीं पिलाया.’

(मीडियाविजिल पर 25 दिसंबर,2018 को प्रकाशित/सभी चित्र विकीपीडिया से साभार)

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