नशे के बारे में

नशे पर कुछ फुटकर टिप्पणियाँ

हाई क्वालिटी पदार्थ का जलवा

नाज़ी जर्मनी के इतिहास के दो ऐसे आयाम हैं, जिन पर ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टि से ठीक से विचार नहीं किया गया है. एक है नशीले पदार्थों का जमकर इस्तेमाल, और दूसरा, टोना-टोटका पर भरोसा. आज के दौर के धुर-दक्षिणपंथी तत्वों की पड़ताल करते समय इनका भी संज्ञान लिया जाना चाहिए. टोना-टोटका और तंत्र-मंत्र के मामले पर कभी बाद में चर्चा करेंगे. अभी नाज़ी जर्मनी में नशे के असर को टटोलते हैं. वैसे तो हमेशा से ही यह पता था कि हिटलर और उसके शासन के शीर्षस्थ भारी नशेड़ी थे तथा सैनिकों और आम लोगों में भी नशेबाज़ी को प्रोत्साहित किया जाता था. सैनिकों और युवाओं को तत्पर और सक्रिय रखने के लिए बाक़ायदा दवाइयाँ बनायी गयीं थीं और माना जाता है कि यूरोप को जीतने में उन नशीली दवाओं का बड़ा योगदान था.

इस विषय पर इतिहासकार और लेखक नॉर्मन ओहलर की एक शानदार किताब 2016 में आयी थी. उन्होंने बताया है कि बहुत रिसर्च के बाद पर्विटिन और आइसोफान नामक टैबलेट तैयार हुए थे, जिन्हें करोड़ों की तादाद में युद्धरत सैनिकों को भेजा जाता था. इसके असर से वे लगातार जागे रहकर लड़ाई कर सकते थे तथा उनमें उन्माद बना रहता था. जहाँ तक नाज़ी नेतृत्व का प्रश्न है, तो सब अपने-अपने च्वाइस से नशा करते थे. कुछ इंजेक्शन से लेनेवाले पदार्थ थे, तो कुछ गोलियों की शक्ल में. युद्ध के आख़िरी सालों में ब्रिटिश लड़ाकू जहाज़ों ने दवा फ़ैक्टरियों को ख़ासकर निशाना बनाया था. इससे हर तरह के नशे की आपूर्ति पर असर पड़ा और नाज़ियों का हौसला टूटता चला गया. हिटलर को भी इंजेक्शन कम पड़ने लगा था, जिससे तहख़ाने में उसकी बेचैनी बहुत बढ़ गयी थी.

लो क्वालिटी पदार्थ की तबाही

क़रीब 13 साल पहले गांधी और लोहिया का अनुयायी होने का दावा करनेवाले नीतीश कुमार ने पूरे बिहार में गली-कूचे में मसालेदार शराब की दुकान खोल दिया था. मनमाने ढंग से इनके टेंडर बाँटे गए और एक ख़ास पार्टी के समर्थकों को उपकृत किया गया. इन दुकानों के लिए स्कूल, अस्पताल या रिहायशी इलाक़ा के पास होने की भी शर्तें नहीं थीं. इन दुकानों में पाउच वाली शराब बिकती थी. कुछ ही दिनों में ट्रक के ट्रक पाउच की सस्ती शराब की ढुलाई होने लगी. निम्न आयवर्ग, बेरोज़गार युवा, ग़रीब कामगार आदि को ग्राहक बनाया गया. उन्हें लत लगायी गयी. इससे समाज और परिवाह तबाह होने लगे, लेकिन बिहार के मुँहज़ोर इस पर ख़ामोश रहे और मीडिया ने भी परवाह नहीं की. सबको जीडीपी की पड़ी थी, पटना और दिल्ली का वाचाल बिहारी नीतीश बाबू के मोहपाश में था.

जब बड़ी तादाद में लोगों को सस्ती और नुक़सानदेह शराब का आदी बना दिया गया, तो 2015 के चुनाव के बाद शराबबंदी का पासा फेंका गया. लेकिन खेल कुछ और था. अब तस्करी और मिलीभगत से शराब बेचना था. मतलब यह कि सरकारी कर देने से भी बचना था तथा शराब के धंधे पर नियंत्रण भी रखना था. आज बिहार में शराब की जिस धड़ल्ले से आपराधिक बिक्री हो रही है, वह भयावह है. इसके साथ ग़रीब तबके के लोगों को शराबबंदी के नाम पर जेलों में ठूँसने का सिलसिला भी चलता रहा है. यही तो शराब के धंधे का गुजरात मॉडल है, जो अब बिहार में क़हर बरपा रहा है.

शराब तो बेमतलब बदनाम है

ऐ मोहतसिब न फेंक मिरे मोहतसिब न फेंक / ज़ालिम शराब है अरे ज़ालिम शराब है

साल के शुरू में डॉन करीम लाला पर मचे घमासान के वक़्त यह लिखा था और तब जिगर मुरादाबादी की यह पंक्तियाँ याद आ गयी थीं. बम्बई में संगठित माफ़िया पर चर्चा में जिन दो बातों का सबसे ज़्यादा ख़्याल रखा चाहिए, वहीं बातें बहस में नहीं होतीं. एक तो यह कि गुजराती और मारवाड़ी महाजनों की इसमें क्या भूमिका रही और दूसरी कि शराब पर पाबंदी लगाने की गांधीवादी ज़िद्द ने क्या किया. करीम लाला जिस पठान गैंग में थे, वह महाजनों के लिए वसूली करने, धमकी देने और लोगों को हटाने व कब्जा का काम करता था. जब तीस के दशक में बंबई में कांग्रेसियों की सरकार आयी, तो उसने तुरंत शराब पर रोक लगा दी. यह सरकार तुरंत ही हट गयी और उसके साथ पाबंदी भी हट गयी. आज़ादी के बाद मोरारजी देसाई शराबबंदी क़ानून लेकर आए, जो आज भी गुजरात में लागू है.

अब कृष्ण कल्पित की पंक्तियाँ याद आ रही हैं- सबने लिक्खा – वली दक्कनी / सबने लिक्खे – मृतकों के बयान / किसी ने नहीं लिखा / वहाँ पर थी शराब पीने पर पाबंदी / शराबियों से वहाँ अपराधियों का सा सलूक किया जाता था। ख़ैर, यह क़ानून 1960 में महाराष्ट्र व गुजरात के बँटवारे के बाद कुछ समय के लिए महाराष्ट्र में रहा, पर बाद में उसमें बहुत छूट दे दी गयी. 1972 में एक परमिट सिस्टम लागू किया गया, जिसके तहत आपको रसरंजन के लिए एक अनुमति हासिल करनी होती है. यह आज भी लागू है. सो, अगर आप मुंबई में बिना परमिट के सेवन करते हैं, तो जाने-अनजाने आप एक अपराध करते हैं, जिसके लिए सज़ा का प्रावधान है.

जैसा कि कल्पित कहते हैं, शराबी से कुछ कहना बेकार / शराबी को कुछ समझाना बेकार. सो, वह जुगाड़ कर ही लेता है. जहाँ जहाँ शराब पर पाबंदी है, वहाँ शराबी भी हैं और शराब का बंदोबस्त करनेवाले माफ़िया भी. बंबई के इतिहास के हर नामचीन डॉन के रिज़्यूम में बाटली की डिलेवरी लिखी हुई है- करीम लाला, वरदा भाई यानी वरदराजन, हाजी मस्तान, यहाँ तक कि डॉन के पेशे को घटिया हरकतों से बदनाम करनेवाला दाऊद इब्राहिम…

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दाऊद ने उत्तर प्रदेश और बिहार में हेरोइन और आधुनिक असलहे मुहैया कराकर उन इलाक़ों को तबाह करने में बड़ी भूमिका निभायी है. इस पहलू पर शोध-अनुसंधान होना चाहिए. इससे यह भी होगा कि अफ़ग़ानिस्तान में पैदा हुए करीम लाला से शुरू हुई बंबई माफ़िया की कहानी को अफ़ग़ानिस्तान से आनेवाले नशीले पदार्थों और आधुनिक हथियारों को बेचनेवाले दाऊद इब्राहिम की कहानी के साथ रखकर एक सर्किल पूरा हो सकता है.

शराबबंदी की सनक का एक और पहलू है पारंपरिक मादक पेय पदार्थों पर रोक. यह शराब बनानेवाले और नशीले पदार्थों के धंधेबाज़ों से कमीशनख़ोरी के लिए होता है. मेरा हमेशा से मानना है कि सभ्यता से उसी दिन अपराध हवा हो जायेंगे, जिस दिन मुनाफ़ाख़ोरी व सूदख़ोरी रोक दी जायेगी और शराबियों को परेशान करना बंद कर दिया जायेगा. फ़ाज़िल जमीली अफ़सोस करते हैं- अब कौन जाके साहिब-ए-मिम्बर से ये कहे / क्यूँ ख़ून पी रहा है सितमगर शराब पी.

अपने हाथों से आदमी अपनी क़िस्मत लिख सकता है, इसका प्रमाण सबसे अच्छा माफ़िया की कथा में मिलता है. अद्भुत यह भी है कि उस कथा में हर लम्हा बाइ चांस है. बहरहाल, बंबई माफ़िया के इतिहास को जानने के लिए हमारे पास कई स्रोत हैं. अच्छा-ख़ासा लिखा, पढ़ा और कहा गया है. मेरी ओर से दो लेखकों के नाम का सुझाव है- विवेक अग्रवाल और एस हुसैन ज़ैदी.

चीन को अंग्रेज़ों ने अफ़ीम से इस क़दर तबाह किया कि एक सदी तक उसे कई देशों ने रौंदा और लूटा. इस दौर को चीन के इतिहास में अपमान की सदी कहा जाता है. इस पर लगाम लगी, जब माओ आए. इन्हें चीनियों को अफ़ीम की लत से बाहर लाने में अरसा लगा. वह कथा और सीआइए का अमेरिका और बाहर नशे के कारोबार में लिप्त होना और अफ़ग़ानिस्तान की बर्बादी का मामला बहुत अहम है. संयुक्त राष्ट्र के नशे पर समझौते की बेईमानी और शंकर गुहा नियोगी की हत्या के बारे में भी ज़रूर जानना चाहिए. इस पर फिर कभी…

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