तो अजीत अंजुम को भी यूट्यूब पर आना पड़ा!

अभिव्यक्ति के लिए उपलब्ध साधनों के और नए साधनों के इस्तेमाल का सिलसिला नया नहीं है. प्राचीन काल में चौराहों और पूजास्थलों में भाषण और चर्चा की परंपरा थी. तकनीक और माध्यमों के विस्तार के साथ तमाम चीज़ें जुड़ती चली गयीं. अनेक विधाओं के विद्वान थॉमस कार्लाईल ने फ़्रांस की क्रांति के सालों को ‘एज ऑफ़ पैंफ़्लेट’ (पर्चा युग) कहा है. अगस्त, 1789 में नेशनल एसेंबली में हर नागरिक को बोलने, लिखने और छापने की पूरी आज़ादी की घोषणा के बाद वहाँ छपाई और लिखाई का महाविस्फ़ोट हुआ था. इससे यह साबित होता है कि अगर साधन हों और उन साधनों के इस्तेमाल की आज़ादी हो, सभ्यताएँ परवान चढ़ती हैं.

social-media-488886_960_720बहरहाल, यह पोस्ट वरिष्ठ पत्रकार अजीत अंजुम के हवाले से है, जो फ़ेसबुक और यूट्यूब वीडियो के ज़रिये ज़रूरी रूप से सक्रिय हुए हैं. इस पर कहा जा रहा है कि यह उनकी मज़बूरी है क्योंकि उन्हें मेनस्ट्रीम मीडिया से किनारे कर दिया गया है. अगर ऐसे किसी पत्रकार को नियमित या स्वतंत्र रूप से हमारी मीडिया में जगह नहीं मिलती है या उन्हें हटा दिया जाता है, तो यह तो अफ़सोस की बात होनी चाहिए. और, यदि ऐसा कोई पत्रकार किसी अन्य माध्यम से अपना काम करने की कोशिश करे, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए. अच्छी बात यह है कि बहुत सारे लोग ऐसे अनेक पत्रकारों और टिप्पणीकारों को छोटे-छोटे डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर पढ़-सुन रहे हैं. होना तो यह चाहिए कि उनके काम पर बातचीत हो, उनके काम की ख़ूबियों और ख़ामियों पर चर्चा हो. सीमित संसाधनों से ऐसे लोग जो भी कर रहे हैं, उससे सीख लेने की ज़रूरत है. हिंदीपट्टी के लोकवृत्त को अपनी कुंठाओं और सीमाओं से बाहर निकलने की कोशिश करनी चाहिए.

बाहर के कुछ नामचीन पत्रकारों का कुछ उदाहरण देता हूँ. जॉर्ज मॉन्बियो ने बीबीसी से करियर की शुरुआत की, किताबें लिखी, स्वतंत्र पत्रकार के रूप में काम करने के दौरान सात देशों ने अपने यहाँ उनके आने पर रोक लगायी, इंडोनेशिया में तो उनकी अनुपस्थिति में उन्हें उम्रक़ैद की सज़ा सुना दी गयी, अपने ही देश ब्रिटेन में उन पर हमला भी हुआ, 1995 में नेल्सन मंडेला के हाथों संयुक्त राष्ट्र के ग्लोबल 500 सम्मान से सम्मानित हुए, द गार्डियन के कॉलमनिस्ट भी हैं, बहुत कुछ किया, अनेक सम्मान मिले, लंबी सूची है. अब उन्होंने कुछ लोगों के साथ मिलकर डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म- डबल डाउन न्यूज़– की स्थापना की है, जिसका वेबसाइट है और यूट्यूब चैनल है. यह पूरी तरह से लोगों के चंदे से चलता है.

ऐसा ही एक उदाहरण ‘द इंटरसेप्ट’ है, जो अनेक बड़े अंतरराष्ट्रीय पत्रकारों ने बनाया है. इनमें ग्लेन ग्रीनवाल्ड हैं, जिन्होंने कई ख़ुलासों के साथ एडवर्ड स्नोडेन की स्टोरी भी ब्रेक की थी. वे चार बार न्यूयॉर्क टाइम्स के बेस्टसेलर लेखक रह चुके हैं. इनके साथ बेट्सी रीड और जेरेमी स्केहिल जैसे बड़े पत्रकार हैं. और भी बहुत सारे सम्मानित पत्रकार है, जिनमें से एक मेहदी हसन के नाम से आप परिचित हैं. वे अलजज़ीरा के साथ थे और उन्होंने भी अनेक ख्यात किताबें लिखी हैं. ब्रिटेन में पढ़े-लिखे युवा पत्रकारों की टीम ‘नोवारा मीडिया’ चलाती है. इन लोगों के खाते में करियर और पुरस्कार भरे पड़े हैं. ये किसी भी संस्थान में जाकर अच्छा वेतन जुगाड़ कर सकते थे. पर, इन्होंने मन का करने का रास्ता चुना है.

एशिया, अफ़्रीका, यूरोप और लातिनी अमेरिका में ऐसे सैंकड़ों प्रयोग हो रहे हैं- संस्थागत रूप से भी और अकेले भी. यहाँ एक बात समझने की ज़रूरत है कि हमारे देश में व्यक्तिगत पूंजी के अभाव और लोगों से अनुदान/चंदा न मिलने के कारण वैसा नहीं हो पा रहा है, जैसा हम अन्यत्र देख रहे हैं. दुःख भी होता है कि हिंदी में ‘न्यू मीडिया’ और ‘वैकल्पिक मीडिया’ के रूप में आए मंच अपनी जगह नहीं बना सके. इस वजह से अच्छे नए लोगों की आमद भी ठीक से नहीं हो पायी है और वे मंच आर्थिक संकट में हैं. एक परेशानी यह है कि वैकल्पिक मीडिया विकल्प बनने की जगह मेनस्ट्रीम की तरह ‘नंबर’ बटोरने, ‘क्लिकबैट’ होने तथा चालू विमर्श को ही भुनाने में लग गया. वैकल्पिक मीडिया को अगर सचमुच वैकल्पिक होना है, तो अनुभवी पत्रकारों और पढ़े-लिखे लोगों की साझेदारी बनानी होगी. जो भी साधन उपलब्ध हैं, उनका बख़ूबी इस्तेमाल होना चाहिए.

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