जब पूंजी कांपती है, हम सब कांपते हैं

साल 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट की चिंताजनक छाया एक बार फिर मंडरा रही है। कार्ल मार्क्स का कहना था कि पैसा इतिहास की धारा तय करने में सबसे बड़ी भूमिका निभाता है और इस पैसे की धारा तय करनेवाली बैंकिंग व्यवस्था को थॉमस जेफरसन आजादी के लिए सबसे बड़ा खतरा मानते थे। आर्थिक मंदी के बारे में पूंजीवाद के बड़े समर्थक भी मानने लगे हैं कि इसके पीछे बड़े बैंकों और वित्तीय संस्थाओं का हाथ है। इस स्थिति को समझने में कोस्ता-गावरास की फिल्म ‘कैपिटल’ (2012), जो कि बैंकिंग व्यवस्था की आंतरिक संरचना की पड़ताल करती है, हमारी मदद कर सकती है। जी (1969), मिसिंग (1982), म्यूजिक बॉक्स (1989), मैड सिटी (1997), इडेन इन वेस्ट (2009) जैसी अनेक फिल्मों के निर्देशक गावरास दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक फिल्मकारों में से एक हैं।

फिल्म अर्थशास्त्री मार्क तुरनील की करियर यात्रा है, जिसका सपना शिक्षक बन कर नोबेल पुरस्कार जीतना है या वित्तीय कॉरपोरेट तंत्र से जुड़कर खूब धन कमाना है। वह दूसरे सपने को पूरा करने के रास्ते को चुनता है और कहता है – ‘पैसे से प्रतिष्ठा मिलती है, पैसा मालिक है, पैसा कभी सोता नहीं’। तुरनील वैश्विक कारोबारवाले एक फ्रांसीसी बैंक के अध्यक्ष का सलाहकार बनता है। कुछ समय बाद अध्यक्ष को बीमारी के कारण पद से हटना पड़ता है। बैंक पर अपने नियंत्रण को कायम रखने की उम्मीद में वह तुरनील को अध्यक्ष बना देता है लेकिन तुरनील अपने वर्चस्व को बनाने में लग जाता है।

उधर बैंक के अन्य निदेशक उसे अपने एजेंडे को लागू करने का मोहरा बनाने की कोशिश करते हैं। बैंक के अमरीकी निवेशक बैंक को अपने हिसाब से चलाने के लिए नये अध्यक्ष का इस्तेमाल करते हैं। उससे खर्च बचाने के लिए कर्मचारियों की छंटनी करवाते हैं और एक जापानी बैंक के अधिग्रहण के लिए दबाव देते हैं, जिसकी माली हालत बहुत खस्ता है। उनका खेल यह था कि इस अधिग्रहण के साथ ही बैंक के शेयरों का भाव गिराने लगेगा और वे अधिक-से-अधिक शेयर लेकर पूरा नियंत्रण स्थापित कर लेंगे। इन सबके एवज उसे बोनस के रूप में भारी रकम मिलती है। तुरनील इसकी जानकारी निदेशक बोर्ड में अपने विरोधियों को देकर उनसे शेयर खरीदवा लेता है और उधर अमरीकी निवेशकों को भी ब्लैकमेल के जरिये शांत कर देता है।

इस कथा के माध्यम से दर्शक बैंकों की कार्यप्रणाली और शोषण से दो-चार होता है। फिल्म की मुख्य कथा के साथ कई उपकथाएं चलती हैं जो तुरनील के पारिवारिक जीवन, धनकुबेरों की ऐय्याशी, राजनीतिक संबंध, बेरोजगार किये गये कर्मचारियों की दशा आदि से परिचय कराती हैं। अधिक विस्तार में जाना फिल्म और संभावित दर्शकों के साथ अन्याय करना होगा।

कोस्ता-गावरास ने एक साक्षात्कार में कहा है – हम सब पूंजी के गुलाम हैं। जब वह कांपती है, हम सब कांपते हैं। जब यह बढ़ती है और जीतती है, हम सब जश्न मनाते हैं। हमें कौन मुक्त करेगा? हमें क्या अपने को मुक्त करना चाहिए? कम-से-कम हमें यह तो जानना ही चाहिए कि इसकी सेवा कौन करता है और कैसे करता है।’ फ्रांसीसी बैंकर स्टीफेन ओस्मौं के उपन्यास ‘ले कपिताल’ पर आधारित और ज्यां पेरेल्वादे की किताब ‘टोटालिटेरियन कैपिटलिज्म’ से प्रभावित यह फिल्म यही करती है।

फिल्म 2008 की मंदी की छाया में चलती है, जिसका मुख्य कारण वे नीतियां थीं, जिनमें वित्तीय बाजार को नियंत्रण-मुक्त करने के लिए कई नियम लाये गये थे। इन नियमों को उद्यमी व निवेशक वारेन बफे ने ‘सामूहिक बर्बादी के आर्थिक हथियार’ की संज्ञा दी थी। यह संकट इतना गहरा था कि अमरीकी फेडरल रिजर्व के प्रमुख बेन बर्नान्की ने आशंका जतायी थी कि शायद यह पूंजीवाद का अंत है। अनुमानों के अनुसार इस संकट का तब का नुकसान आठ ट्रिलियन डॉलर से अधिक था। फिल्म हमें यह बताती है कि यह सब ‘काउ बॉय कैपिटलिज्म’ और ‘तुरंत मुनाफा’ के पैरोकारों की कारस्तानी थी। फिल्म इस संदेश के साथ खत्म होती है कि बैंकर मजे में हैं और यह मजा तब तक चलता रहेगा, जब तक सब कुछ टूटकर बिखर न जाए।

आज जब आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक प्रश्न भारी-भरकम शब्दावलियों, अकादमिक बहसों और मूर्खता की हद तक जा चुके प्रतिरोध के रिटोरिक में कैद हैं, कोस्ता-गावरास की ‘कैपिटल’ सहज ढंग से हमें बहुत कुछ बता-समझा जाती है।

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