लिबरल सरलीकरण है आतिश तासीर का लेख

भारतीय और विदेशी मीडिया में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री बनने से बहुत पहले से एक ‘हाईली पोलराइज़िंग फ़ीगर’ कहा जाता रहा है. इस संज्ञा का मुख्य आधार उनके गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के कुछ महीने बाद हुए जनसंहार, बाद के अनेक राज्य-स्तरीय चुनावों में उनके बयान तथा उनके सरकार की कार्यशैली थी. उनकी राजनीति और व्यक्तित्व ने ‘पोलराइज़ेशन’ (ध्रुवीकरण) के आधार पर लगातार गुजरात के चुनाव जीते. राज्य के भीतर जीत का कारण भले ही ध्रुवीकरण हो, पर मीडिया नैरेटिव में इसे विकास के कथित ‘गुजरात मॉडल’ के नाम पर ‘प्रचारित’ किया गया. इस मॉडल ने जहां अन्य राज्यों के शहरी उपभोक्ता वर्ग को आकर्षित किया, वहीं धुर दक्षिणपंथी तत्वों के लिए इसमें एक तत्व शासन की वह शैली भी थी, जो भाजपा की अन्य राज्य सरकारों से गुजरात को अलग करती थी.

मोदी की गुजरात सरकार पर विपक्ष के हमले को भी भाजपा और संबंधित संगठनों ने राज्य के भीतर और बाहर अपनी सहूलियत से अलग-अलग मतदाता वर्गों में भुनाने की कोशिश की. वे शहरी उपभोक्ता वर्ग से कह सकते थे कि विपक्ष विकास में बाधक है. वे अपने पारंपरिक मतदाताओं में मोदी के हिंदुत्व को आदर्श के रूप में स्थापित कर सकते थे. ‘विकास पुरुष’ की छवि भारत की बड़ी कॉर्पोरेट हस्तियों द्वारा मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में देखने के बयानों से और मजबूत हुई. इन हस्तियों में मुख्य रूप से वे लोग थे, जिन्हें गुजरात में कारोबार करने में सरकारी मदद मिली थी. जब ये लोग सार्वजनिक रूप से मोदी को प्रधानमंत्री पद पर देखने की बात कह रहे थे, भाजपा में इस मसले पर सुगबुगाहट ही थी क्योंकि अभी भी नेतृत्व एक वरिष्ठ ‘पोलराइज़िंग फ़ीगर’ के हाथ में था, जो संयोग से पार्टी के भीतर मोदी के संरक्षक भी माने जाते थे.

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‘टाइम’ पत्रिका में आतिश तासीर के आवरण लेख का शीर्षक ‘इंडियाज़ डिवाइडर इन चीफ़’ इसी ‘हाईली पोलराइज़िंग फ़ीगर’ संज्ञा का ही एक संस्करण है. लेकिन उनका लेख मोदी को समकालीन राजनीतिक इतिहास के भीतर रख कर विश्लेषित करने से चूक जाता है. लेख की पहली ही पंक्ति में कहा गया है कि बड़े लोकतंत्रों में जहां पॉपुलिज़्म ने जीत हासिल की, उनमें भारत पहला था. यह तथ्यात्मक रूप से भी ग़लत है और ‘पॉपुलिज़्म’ की अवधारणा के हिसाब से भी सही नहीं है. यूरोपीय देशों में और अमेरिका में जो पिछले सालों में पॉपुलिज़्म का उभार हुआ है, उसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि उसके खिलाड़ी राजनीति से बाहर के रहे हैं या फिर उसके हाशिये से.

यूरोप के क़रीब दर्ज़न भर देशों की सरकार को भीतर और बाहर से पॉपुलिस्ट पार्टियों का समर्थन है, पर वे दो-चार देशों में ही निर्णायक स्थिति में हैं. अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप ज़रूर पॉपुलिस्ट एजेंडे पर रिपब्लिकन पार्टी की प्राइमरी और फिर राष्ट्रपति चुनाव जीते, पर उनकी नीतियों और उनकी पार्टी की नीतियों में बहुत ख़ास अंतर नहीं है. यह भी ध्यान रहे कि चुनाव जीतने में उनकी पार्टी मशीनरी का भी योगदान ख़ूब रहा था. लेकिन सबसे ज़्यादा योगदान अमेरिकी चुनाव प्रणाली का है, जहां मतदाताओं के सीधे मतदान से राष्ट्रपति का चुनाव नहीं होता है, बल्कि मतदाताओं के प्रतिनिधि राष्ट्रपति चुनते हैं. उल्लेखनीय है कि ट्रंप से डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को 30 लाख लोकप्रिय वोट अधिक मिले थे.

बहरहाल, आतिश तासीर ने मोदी की तुलना करते हुए यूरोपीय पॉपुलिस्ट नेताओं का उदाहरण नहीं दिया है. पर यह विवरण इसलिए भी ज़रूरी है कि पॉपुलिज़्म, फ़ार राइट, धुर दक्षिणपंथ आदि शब्दों को बहुत सोच-समझकर इस्तेमाल किया जाना चाहिए. सिर्फ़ दबे-कुचले, ग़रीब, स्थानीय, ख़ास समुदाय, उच्च वर्ग के विरुद्ध आदि तत्वों से जुड़े नारों और भाषणों के आधार पर ही श्रेणियां बनायी जायेंगी, तो फिर यह भी कहा जाना चाहिए कि भारतीय राजनीति में लगभग सभी दल और सरकारें पॉपुलिज़्म से प्रेरित रही हैं. हिंदी में बहुत अरसे से ‘लोकलुभावन’ शब्द का इस्तेमाल भी होता रहा है, जिसे पॉपुलिज़्म का समानार्थी कहा जा सकता है.

तासीर मोदी को तुर्की के राष्ट्रपति एरदोआं और ब्राज़ील के राष्ट्रपति जायर बोलसोनारो के साथ रखते हैं. वे नियो-फ़ासिस्टों, ब्रेक्ज़िट समर्थकों, ट्रंप और इमरान ख़ान को भी जोड़ते हैं. जैसा कि मैंने पहले कहा है, ऐसा समूहबद्ध करना नये उभारों को सतही ढंग से समझना होगा. एरदोआं लगभग दो दशकों से तुर्की की राजनीति के शीर्ष पर हैं और उनका उभार उन परिस्थितियों में नहीं हुआ है, जैसा कि मोदी या ट्रंप का हुआ है. ट्रंप और मोदी की स्थितियों में बड़े अंतर के कुछ बिंदुओं को ऊपर लिखा जा चुका है. ब्रेक्ज़िट को लेकर ब्रिटेन में बहस आज की नहीं है, सत्तर के दशक से चली आ रही है. इसके पक्ष और विपक्ष में टोरी और लेबर पार्टियों में बहस होती रही है. तासीर लंदन में हैं और इसे समझना मुश्किल नहीं होगा. कुछ नहीं तो, टोनी बेन की डायरी ही देख लें. अगर मान भी लें कि यह एक पॉपुलिस्ट उभार था, तो फिर बाद के चुनाव में यूकिप पार्टी बर्बाद क्यों हो गयी, जो इसका श्रेय ले रही थी? यह भी कि टोरी सत्ता में क्यों बने रहे और जेरेमी कॉर्बिन की लेबर को बढ़त क्यों मिलती रही? इमरान ख़ान पॉपुलिस्ट हैं, तो फिर सेना के पैंतरे को क्या कहा जायेगा, जो कभी इस, तो कभी उस पार्टी के साथ खड़ी होती रही है? उनकी जीत में सेना, अमेरिका, सऊदी अरब और अफ़ग़ानिस्तान के समीकरणों को कैसे अलहदा रखा जा सकता है? असल में वे नवाज़ शरीफ़ की नून लीग के वारिस हैं, जो भ्रष्टाचार के कारण अपनी साख खो चुकी थी. उन्हें दक्षिणपंथी कहा जाना चाहिए, लेकिन फ़ार राइट के साथ उन्हें रखना राजनीतिक ग़लती होगी.

अब आते हैं बोलसोनारो पर. इसमें कोई दो राय नहीं है कि वे ट्रंप से अधिक रेडिकल राइटविंग नज़र आते हैं और यूरोप के क्रिप्टो-नाज़ी ख़ेमे के जैसे हैं. पॉपुलिस्ट राजनीति के स्वयंभू पोप स्टीव बैनन भी उन्हें हंगरी के ओरबान और इटली के साल्विनी के साथ रखते हैं. पर, क्या हम यह भूल जायें कि ब्राज़ील में अंतरराष्ट्रीय वित्तीय मशीनरी ने अमेरिकी सहयोग से लूला डी सिल्वा और उनकी उत्तराधिकारी दिल्मा रौसेफ़ को किनारे किया और भ्रष्ट मिशेल टेमर को पदासीन किया. लूला, जो कि जेल में रहते हुए भी ओपिनियन पोल में सबसे आगे थे, उन्हें चुनाव नहीं लड़ने दिया गया और वित्तीय मशीनरी ने बोलसोनारो को सोशल मीडिया और कुख्यात कैम्ब्रिज एनालायटिका से मदद पहुंचाई. ब्राज़ील में इस एनालायटिका की करतूत पर जांच भी चल रही है. मिशेल टेमर उम्मीद पर खरा नहीं उतरा, तो किनारे कर दिया गया. लातीनी अमेरिका में मार्केट मशीनरी दशकों से नेताओं को ‘यूज़ एंड थ्रो’ की समझ से इस्तेमाल करती रही है.

दिलचस्प बात यह है कि यूरोपीय फ़ार राइट तो फिर भी ग्लोबलिस्टों और फ़ाइनेंसियल मशीन के ख़िलाफ़ खुल कर बोलता है, ब्रिटेन के नाइजल फ़राज भी और बैनन भी, पर तुर्की के एरदोआं और बोलसोनारो तो इनके अज़ीज़ होना चाहते हैं. यही हाल नरेंद्र मोदी का भी है. एरदोआं चाहते हैं कि वे मुस्लिम समुदाय के वैश्विक प्रवक्ता बनें और उनके देश को यूरोपीय संघ में जगह मिले और बोलसोनारो लातीनी अमेरिका में अमेरिकी हितों को मदद पहुंचा रहे हैं. यहां मोदी बिलकुल अलग हैं. उनसे तो सार्क नहीं संभाला गया और दावोस के एकनॉमिक फ़ोरम, विश्व व्यापार संगठन तथा रूस के साथ वाले शंघाई सहयोग तथा ब्रिक्स जैसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उन्हें चीन के पीछे चलना पड़ता है तथा अन्य कई मामलों में अमेरिका की माननी पड़ती है, जैसे कि ईरान से तेल आयात करने के मसला. एरदोआँ और उनके गुरु एरबाकन ने तुर्की के सैन्य और सेकुलर अधिनायकवाद के ख़िलाफ़ अस्सी के दशक में इस्लामिक विचारों के आधार पर प्रतिरोध किया और आगे बढ़े. संगठन और राजनीति उनके हिसाब से बने और चले. लेकिन मोदी के पीछे 1925 से चला आ रहा मजबूत संगठन है और उसकी वैचारिकी औपनिवेशिक भारत के दौरान ही तय हो चुकी थी.

बोलसोनारो एक तरह से मोहरे के रूप में उठाये और बैठाये गये हैं. अब इन दोनों से मोदी की तुलना करना इतिहास को लापरवाह ढंग से पढ़ना होगा. हां, बहुत हुआ, तो मोदी को एरदोआं और पुतिन की तरह स्ट्रॉंगमैन (बाहुबली) कह सकते हैं, पर उन दोनों का बाहुबल अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय राजनीति में दिखता है. हमारे यहां बाहुबल इंटरनेट ट्रोलिंग, टीवी स्टूडियो की चीख़ों और सड़कों पर लिंचिंग में दिखता है. इसे बाहुबल का भारतीय संस्करण कह सकते हैं. यह भी ध्यान रहे कि जनसंघ के दौर से आज की भाजपा तक भारतीय दक्षिणपंथ ख़ुले बाज़ार की नीति का समर्थक रहा है. वह नव-उदारवादी नीतियों का घोर समर्थक रहा है. स्वदेशी, संस्कृति, कल्चरल लॉस, लेफ़्ट-लिबरल हेगेमनी, एफ़डीआइ विरोध, आधार विरोध, परमाणु समझौता विरोध आदि पैंतरे उसके लिए राजनीति साधने के औज़ार भर हैं. वह आर्थिक और सामाजिक असंतोष को विकृत कर अपने कुत्सित एजेंडे को पूरा करने की चाल चलता है. वह दंगाई भी होता है और दावोस में विश्व के बहुपक्षीय होने की बात भी करता है. वह साधु वेश में डॉलर और डिमोनेटाइज़ेशन पर प्रवचन कर सकता है और टाई-कोट लगाकर टैक्स-हेवेन में ऑफ़-शोर कंपनी भी खोल सकता है. उसकी आर्थिक सोच ही नहीं, राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के मामलों में भी उसकी हरकतें पोंज़ी फ़्रॉड की तरह होती हैं.

मोदी प्रधानमंत्री बनने से पहले एक धनी राज्य के 12 साल तक मुख्यमंत्री रह चुके थे, वे अपनी पार्टी और पार्टी को संचालित करनेवाली संस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पदाधिकारी रह चुके थे, भाजपा के बड़े ‘पोलराइज़िंग फ़ीगर’ या ‘डिवाइडर’ रह चुके लालकृष्ण आडवाणी और मुरली मनोहर जोशी के सबसे बड़े अभियानों के मुख्य आयोजक रह चुके थे. वे संघ की राजनीतिक रणनीति के एक अध्याय हैं, वे बाहरी नहीं हैं, वे पॉपुलिस्ट नहीं हैं, वे एक एजेंडे को आगे ले जानेवाले एपेरेटस हैं. यह नहीं भूला जाना चाहिए कि उनकी पार्टी राज्यों में और केंद्र में सत्ता में रही है तथा विपक्ष में रहते हुए बड़ी राजनीतिक ताक़त रही है. यदि केंद्र में मार्च, 2002 में कोई ग़ैर-भाजपा सरकार होती, तो बहुत संभव था कि आतिश तासीर को मोदी पर न तो लेख लिखना पड़ता और न ही राम माधव और शौर्य डोभाल के बुलावे पर उन्हें दक्षिणपंथी सेमीनारों में ‘कल्चरल लॉस’ पर दुखी होना होता. कल बहुत संभव है कि वे नानाजी देशमुख, बलराज मधोक और आडवाणी की तरह किसी कोने में पड़े दिखायी दें. और, कोई तासीर फिर ऐसा ही आलेख किसी योगी या किसी बिस्वासरमा पर लिखे.

मोदी की राजनीति दीनदयाल उपाध्याय के जनसंघ और अटल बिहारी वाजपेयी की भाजपा का ही विस्तार है. समय, सत्ता और संसाधन की वजह से इनकी तीव्रता क्रमशः बढ़ती रही है. यह चिंता का विषय है, आश्चर्य का नहीं.

अगर मोदी पिछली सरकार की असफलताओं पर सवार होकर पॉपुलिस्ट होकर आये, तो क्या यह नहीं देखा जाना चाहिए कि 2009 से 2014 में भाजपा के वोटों में कितना उछाला आया? साल 2014 में भाजपा के पास 31 फ़ीसदी से कुछ ही अधिक वोट आये थे. इस बढ़ते वोट का एक स्पष्टीकरण भाजपा का छोटे दलों से गठबंधन के गणित में भी देखा जाना चाहिए. कांग्रेस 19 फ़ीसदी से कुछ ही अधिक रही थी. साल 2009 में भाजपा के पास 18.5 फ़ीसदी वोट थे, पर उसे 116 सीटें मिली थीं, पर 19.3 फ़ीसदी लाकर भी 2014 में कांग्रेस 44 सीटों पर सिमट गयी थी. पिछले चुनाव में भाजपा गठबंधन के पास 38.5 फ़ीसदी वोट थे, जबकि कांग्रेस गठबंधन को 23 फ़ीसदी से कुछ कम मत मिले थे. इसका मतलब यह हुआ कि लगभग 39 फ़ीसदी वोट अन्य दलों के पास गये थे. यह भी उल्लेखनीय है कि अनेक हिस्सों में भाजपा अपनी मौजूदगी नहीं जता सकी थी. अगर आप ध्यान से देखेंगे, तो कांग्रेस की छवि के ध्वस्त हो जाने और उत्तर प्रदेश में अच्छी रणनीति का लाभ मोदी को मिला, जो अप्रैल-मई, 2014 के बाद से लगातार कमतर होता जा रहा है.

कहने का मतलब यह है कि मोदी के करिश्मे से ज़्यादा निर्णायक कांग्रेस की छवि में भारी कमी और विपक्षी एकजुटता का अभाव था. इसका एक प्रमाण यह है कि 2014 के विधानसभा चुनावों में भाजपा के वोट लोकसभा से कम हुए थे और 2015 में दिल्ली एवं बिहार में उसे भारी हार मिली थी. उपचुनावों में भी पार्टी अक्सर पराजित हुई और पिछले साल उसे तीन राज्य कांग्रेस के हाथों गंवाना पड़ा. साल 2017 में गुजरात भी बमुश्किल बच सका था. हां, उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में वह लोकसभा के बराबर वोट प्रतिशत हासिल कर सकी थी. इससे साफ़ है कि विभिन्न समीकरणों ने नतीज़ों पर असर डाला था और मोदी के व्यक्तित्व का उसमें ख़ास मतलब नहीं था. वह सिर्फ़ भाजपा के प्रचार अभियान का एक तत्व था, जिसे मीडिया नैरेटिव के सहारे आजतक एम्प्लिफाई किया जाता रहा है. तासीर ने कांग्रेस के वंशवाद को रेखांकित किया है. उन्हें याद करना चाहिए कि वंशवाद भारत में ही नहीं, अन्यत्र भी है. और, इसी कांग्रेस ने तभी जीत हासिल भी की है, जब उसके शीर्ष पर कोई नेहरू परिवार का व्यक्ति होता है. अधिक समय नहीं बीता है, सोनिया गांधी के नेतृत्व में 2004-14 तक इसी कांग्रेस ने लगातार केंद्र में शासन किया था और अब राहुल गांधी की अगुवाई में बेहतरी की ओर अग्रसर है.

भारत की हालिया राजनीति को ठीक से समझना हो, तो एक बात उसमें सबसे अधिक मदद कर सकती है, और वह है पार्टियों के पास धन की आमद का हिसाब. मार्च में ब्लूमबर्ग के जीनेट रोड्रिग्स, अर्चना चौधरी और हाना डोर्मिडो ने इस पर विस्तार से रिपोर्ट की थी. उसे देखा जाना चाहिए. लोकतंत्र सिर्फ़ नेता और मतदान का गणित नहीं होता. किसी दौर में भले होता हो, आज तो बिलकुल नहीं होता. कोई नेता और दल किस शैली में अपनी सियासत करता है, उसे भाषणों और नारों से परे जाकर देखना चाहिए. गठबंधनों के जोड़-तोड़ के पैंतरे भी लोकतंत्र को आकार देते हैं.

आख़िरी बात, भारतीय समाज में नाना प्रकार के फ़ॉल्ट लाइन हैं. लोकतांत्रिक शामियाने में ये सब अपनी जगह तलाश रहे हैं. इनके साथ जोड़ और तोड़ बड़ी पार्टियों के सारे फ़ोर्मूले को तबाह करने का दम रखते हैं. इसे मोदी ने बहुत हद तक साधा है, जिसका साफ़ नतीज़ा उत्तर प्रदेश और पूर्वोत्तर में देखा जा सकता है. एक हद तक गुजरात विधानसभा चुनाव में इसी कोशिश से कांग्रेस को बढ़त मिली थी. तासीर ने जितने शब्द नेहरू से मोदी तक का विवरण देने तथा मोदी के पांच सालों का चुनींदा हिसाब करने में ख़र्च किये हैं, उनमें से कुछ मोदी की कॉरपोरेट-फ़्रेंडली नीतियों और भारतीय मीडिया के रेंगने पर भी ख़र्चना चाहिए था. लेफ़्ट इंटेलेजेंसिया पर बतियाते हुए राइट-विंग बौद्धिकी का भी हिसाब लगा लेना था. फ़ेक न्यूज़ और फ़र्ज़ी मुक़दमों पर भी कुछ कह लेना था.

फ़ार राइट और पॉपुलिज़्म के यूरोपीय फ़ोर्मूले को सीधे भारत पर लागू करने से गड़बड़ विश्लेषण हासिल होगा. मोदी न तो ट्रंप हैं और न ही पुतिन और न ही इंदिरा गांधी, वे जयललिता या मायावती या ममता या एंटी रामाराव भी नहीं हैं. बोलसोनारो और एरदोआं तो कतई नहीं. वे संघ की सुविचारित मशीनरी के एक बेहद सफल पुर्ज़े भर हैं. आतिश तासीर लिबरल ट्रैप में हैं, जिसमें 2014 में हमारे अनेक लिबरल विद्वान फंस गये थे. एक जगह उन्होंने लिखा है कि पाकिस्तानी पिता और एलीट भारतीय माता की संतान होने के चलते उन्हें मोदी के सत्ता में आने का एक डर भी था, पर वे भारतीय संस्कृति के मोदी विचार से सहमति जैसा भाव रखते थे. एक तो तासीर भूल गये कि उनकी माता समेत बड़ी संख्या में एलीटों का साथ मोदी को तब भी मिला था और आज भी है. कुछ ने यू-टर्न ज़रूर लिया है. आपने एकेडेमिया और पब्लिक स्फ़ेयर में लेफ़्ट वर्चस्व की बात कही है. दक्षिणी दिल्ली के कुछ ठीहों के लिए यह बात शायद सच हो, पर आप क़स्बों और अन्य शहरों के लिखने-पढ़नेवालों को देखते, तो ऐसा नहीं कहते.

लगता है कि मोदी के अपने ‘आउटसाउडर’ होने के दावे को तासीर ने कुछ अधिक गंभीरता से ले लिया है. उन्हें यह पता होना चाहिए कि बरसों तक संघ-भाजपा को चुनौती लेफ़्ट या कांग्रेस ने नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की राजनीति करनेवालों की तरफ़ से मिली है और मोदी को जिताने में भी उनमें से एक हिस्से का सहयोग रहा है. तासीर ने अपनी बात पॉपुलिज़्म से शुरू की है, तो इस लेख को वहीं ख़त्म करना ठीक होगा. जो आज की दक्षिणपंथी धाराएं पुरानी दक्षिणपंथी परंपराओं का विस्तार हैं, उन्हें पॉपुलिज़्म कहना ठीक नहीं होगा. इसीलिए फ़ार राइट और पॉपुलिस्ट हमेशा समानार्थी तौर पर इस्तेमाल नहीं हो सकते. बहरहाल, मोदी या किसी नेता के इर्द-गिर्द राजनीतिक विमर्श सेट करना स्पिन मास्टरों का काम हो सकता है, किसी रचनात्मक टिप्पणीकार का नहीं.

(‘न्यूज़लाउंडरी’ पर 11 मई, 2019 को प्रकाशित)

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